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*💥परम प्रतापी वीर योद्धा, भारत माता के लाल छत्रपति शिवाजी महाराज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर जी (श्री गुरूजी) की जयंती पर नमन*

✨*भारत की अद्भुत व अनुपम संस्कृति, ओजस्वी, अजेय और समृद्ध भारत के संवाहक श्री गुरूजी*

*🌸भारत की संस्कृति, प्रबुद्ध राष्ट्रवाद, विविधता में एकता और सहिष्णुता की संस्कृति के प्रवर्तक श्री गुरूजी की राष्ट्रभक्ति को नमन*

*🌺साहस और शौर्य की मिसाल छत्रपति शिवाजी*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 19 फरवरी। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर जी (श्री गुरूजी) और परम प्रतापी वीर योद्धा, भारत माता के लाल छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर श्रद्धाजंलि अर्पित कर उनकी राष्ट्रभक्ति को नमन किया।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि श्री गुरूजी ने ‘‘राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम” अर्थात सबकुछ राष्‍ट्र को समर्पित है, यह मेरा नही है, कुछ भी मेरा नहीं है, जो भी कुछ है वह सब राष्ट्र का है और राष्ट्र को ही समर्पित है और इस मंत्र उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ कर दिखाया। वे सदैव राष्ट्र निर्माण के लिये तत्पर रहे। उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र के नवोत्थान के लिये समर्पित कर दिया। उनकी राष्ट्रभक्ति, अद्भुत व्यक्तित्व और विलक्षण ऊर्जा का ही प्रताप है कि आज हम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी दिव्य संस्था को देख रहे हैं। श्री गुरूजी की राष्ट्रभक्ति, प्रेम, सहिष्णुता की सुगंध आज भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परिवार में महसूस की जा सकती है।

स्वामी जी ने आज छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती पर उनकी राष्ट्रभक्ति व स्वराज्य के प्रति प्रेम को नमन करते हुये कहा कि उन्होंने साहस और शौर्य की मिसाल कायम की। उनकी माता ने उनके हृदय में जो स्वाधिनता की लौ प्रज्वलित की परन्तु उसे उन्होंने मशाल बनाकर अपनी मातृभूमि की रक्षा व हिन्दवी स्वराज्य के लिये सर्वस्व समर्पित कर दिया और भारतीयों को एक भयमुक्त राज्य के दर्शन कराये।

स्वामी जी ने कहा कि दोनों महापुरूषों ने राष्ट्र गौरव व संस्कृति के उत्कर्ष के लिये अद्भुत कार्य किये। उनकी विद्वता और कर्मठता की सुगंध आज भी भारत की माटी में व्याप्त है।

स्वामी जी ने कहा कि महापुरूषों के विचार, मूल, मूल्य और संस्कृति से जुड़ कर ही आज की युवा पीढ़ी अपनी जडं़े मजबूत कर सकती है। भारतीय संस्कृति समर्पण की संस्कृति है; स्वयं को तलाशने; तराशने तथा स्वयं से वयं तक की यात्रा की संस्कृति है और यही संदेश हमारे महापुरूषों ने भी दिया है। भारतीय संस्कृति साधना, समर्पण और सेवा तीन पिलरों पर आधारित है। आज भारतीय समाज को जरूरत है साधना, समर्पण और सेवा के सूत्रों को आत्मसात करने की। आईये प्राचीन गौरवशाली विरासत तथा सांस्कृतिक धरोहर के सूत्रों की सुदृढ़ नींव पर नए मूल्यों व नई संस्कृति को विकसित करें। प्राचीन मूल्यों को सहेजें; सवारें और आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता के महासंगम से सार्वभौमिक एकता और शान्ति का निर्माण करने वाली संस्कृति को विकसित करें।

आज की परमार्थ निकेतन गंगा आरती दोनों पूज्य महापुरूषों को समर्पित की।

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