न्यूज टेबलेट  यश हरिद्वार

*💫जैन मुनि पधारे परमार्थ निकेतन*

*💥सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, और सम्यक चरित्र से वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को सिंचित करना नितांत आवश्यक*

*✨अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद जी की पुण्यतिथि पर अर्पित की भावभीनी श्रद्धाजंलि*

*🌺शुद्धता और साधुता चले साथ साथ*

*स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 27 फरवरी। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद जी और महान समाजसेवक श्री नानाजी देशमुख जी की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये उनकी देशभक्ति को नमन किया।

परमार्थ निकेतन में जैन मुनियों का दल पधारा। उन्होंने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर भारत की संस्कृति, विकास, पर्यावरण संरक्षण आदि विषयों पर चर्चा की। स्वामी जी ने पूरे दल को पौधा रोपण के लिये प्रेरित किया।

परमार्थ निकेतन विश्व की सभी संस्कृतियों का आदरपूर्वक अभिनन्दन करता है। अक्सर यहां पर विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय देखने को मिलता है। यहां पर जैन धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म और अन्य धर्मों को मानने वाले अनुयायी आते हैं और सभी को साथ लेकर विश्व मंगल की संस्कृति पर चिंतन किया जाता है। स्वामी जी का मानना है कि भारत को एक अद्भुत राष्ट्र बनाने में संतों का विलक्षण योगदान है।

स्वामी जी ने 45 वर्ष पूर्व अमेरिका में हिन्दू जैन मन्दिर का निर्माण समन्वय और सहिष्णुता की संस्कृति को विस्तार प्रदान करने के लिये किया था। यह विश्व का पहला ऐसा मन्दिर है जहां पर श्वेताम्बर और दिगम्बर मिलकर अपनी-अपनी पूजा-अर्चना करते हैं। आज भी यह पूूरे विश्व के लिये समन्वय की संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है। अमेरिका का यह हिन्दू जैन मन्दिर इस धरती पर यह पहला मन्दिर है जहां पर सभी परम्परायें मिलकर उत्सव मनाती है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भगवान महावीर जी ने जो पांच महाव्रत दिये वह जीवन के अनमोल सूत्र है, जो हर युग और व्यक्ति के लिये प्रासंगिक है। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और शुद्धता का जो संदेश दिया वह वास्तव में भारत की संस्कृति के मूल में समाहित है।

जैन धर्म में 24 महान उपदेशक हुए, जिनमें से अंतिम भगवान महावीर थे। वे विभूतियाँ जिन्होंने जीवित रहते हुए सम्पूर्ण ज्ञान व मोक्ष प्राप्त कर लिया और जनसमुदाय को भी इसका उपदेश दिया ऐसे 24 उपदेशक अर्थात् तीर्थंकर हुये। तीर्थंकर अर्थात ’नदी निर्माता’ जो सांसारिक जीवन के सतत् प्रवाह को पार कर सकता हो वही तीर्थंकर है। आज भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो अपने जीवन के साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिये भी कार्य करे।

जैन-दर्शन हमें शिक्षा देता है कि किसी भी जीव को शारीरिक या मानसिक पीड़ा पहुँचाना हिंसा है, प्रकृति में सभी जीवों का जीवन समान महत्त्व का है। सत्य के संबंध में भी जैन-दर्शन का दृष्टिकोण अत्यंत सरल और स्पष्ट है कि व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में सत्य से विचलित नहीं होना चाहिये और दूसरों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार करना चाहिये।

स्वामी जी ने कहा कि यह दर्शन एक सादा व संतोषी जीवन जीने की शिक्षा प्रदान करता है। जैन-दर्शन के पाँचों नैतिक सिद्धांत न केवल व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन को सँवारते हैं बल्कि समाज में आपसी भाईचारा, अहिंसा, सत्य और सद्चरित्रता को भी प्रोत्साहित करते हैं जो हर युग के लिये प्रासंगिक है।

स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सहिष्णुता की है जो जैन दर्शन का मूल सिंद्धान्त भी है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है विभिन्न विचारधाराओं और धर्मों के साथ सामंजस्य बनाकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर कार्य करना है क्योंकि राष्ट्र है तो हम है; हमारी पहचान है। एक राष्ट्र के निर्माण के लिये सभी का प्रतिनिधित्व अत्यंत आवश्यक है। अक्सर संस्कृतियों की विविधता को एक मजबूत एकल राष्ट्रीय पहचान के निर्माण के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जाता है परन्तु भारत में सभी संस्कृतियों के मध्य अद्भुत सामंजस्य है जिसे आगे भी बनाये रखना हम सभी का परम कर्तव्य है।

इस अवसर पर राचेत मुनिजी, पुनीत मुनिजी, सुरांश मुनिजी, ऋषभ मुनिजी, तेजस मुनिजी, साध्वी पर्णा जी आदि उपस्थित थे।

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