यश हरिद्वार न्यूज़ ✍️

देवेश वर्मा रिपोर्ट ✍️
18अक्टूबर 2026 रबाई डेविड सैपरस्टीन, अमेरिका के पूर्व राजदूत, (धार्मिक स्वतंत्रता) डॉ. व्हिटनी क्लेटन, जी20 अंतरधार्मिक मंच के कार्यकारी निदेशक, गवर्नर डेविड बीज़ली, दक्षिण कैरोलिना के पूर्व गवर्नर एवं संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के पूर्व कार्यकारी निदेशक, श्री मार्टिन लूथर किंग तृतीय अमेरिका के प्रसिद्ध नागरिक अधिकार नेता डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के सुपुत्र, सहित वैश्विक नेतृत्व एवं अंतरधार्मिक संवाद के प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों की उपस्थिति में सनातन संस्कृति की सार्वभौमिक चेतना का उद्घोष।

सॉल्ट लेक सिटी, अमेरिका, 18 अक्टूबर 2026। परमार्थ निकेतन की डा साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध सॉल्ट लेक टैबरनेकल में आयोजित जी 20 इंटरफेथ फोरम एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में विशेष रूप से आमंत्रित किया और हजारों लोगों के खचाखच भरे हॉल में डा साध्वी भगवती सरस्वती जी ने विशेष संबोधन देते हुए विश्व समुदाय का आह्वान किया कि आस्था को आशा, करुणा, मानवीय गरिमा और विश्वशांति की सक्रिय शक्ति बनाया जाए। ‘अविचल आशा, साझा भविष्य’ विषय पर अपने प्रेरक संबोधन में उन्होंने भारत की प्राचीन सनातन एवं वैदिक ज्ञान परंपरा के सार्वभौमिक संदेश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को वैश्विक सद्भाव और मानवता के साझा भविष्य का आधार बताया।

इस अंतरराष्ट्रीय समारोह में विभिन्न धर्मों, आध्यात्मिक परंपराओं और वैश्विक संस्थाओं के प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। इस अवसर पर भारत से डा साध्वी भगवती सरस्वती जी, जी 20 इंटरफेथ फोरम के कार्यकारी निदेशक डॉ. व्हिटनी क्लेटन, दक्षिण कैरोलाइना के पूर्व गवर्नर एवं संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के पूर्व कार्यकारी निदेशक गवर्नर डेविड बीज़ली तथा अमेरिका के महान नागरिक अधिकार नेता डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पुत्र मार्टिन लूथर किंग तृतीय अपनी पत्नी के साथ उपस्थित रहे तथा अनेकों, गणमान्य, महत्वपूर्ण विभिन्न क्षेत्रों के नेता एवं प्रतिनिधिगण उपस्थित थे।
नवरात्रि के पावन पर्व पर वैश्विक मंच पर नारी शक्ति की सशक्त स्वर बनकर उभरीं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी का प्रतिनिधित्व इस शाश्वत सत्य का उद्घोष है कि नारी केवल शक्ति का स्वरूप नहीं, बल्कि नेतृत्व, चेतना, करुणा और परिवर्तन की वैश्विक वाहक भी है। सनातन संस्कृति की आध्यात्मिक गरिमा और आधुनिक नारी के आत्मविश्वास का यह अद्भुत संगम नारी सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायी मिसाल है।
उद्घाटन समारोह में द चर्च ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर-डे सेंट्स के अध्यक्ष डैलिन एच. ओक्स मेज़बान के रूप में उपस्थित थे। माइकल ओ. लीविट ने स्वागत संबोधन दिया, जबकि कॉकसस क्षेत्र के मुख्य इमाम हिज वर्च्यू इमाम अल्लाहशकुर पाशाज़ादेह ने प्रार्थना प्रस्तुत की। मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव शेख डॉ. मोहम्मद बिन अब्दुलकरीम अल-ईसा, जी20 इंटरफेथ फोरम एसोसिएशन के अध्यक्ष डब्ल्यू. कोल डरहम जूनियर और इसकी उपाध्यक्ष एवं जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के बर्कले सेंटर फॉर रिलिजन, पीस एंड वर्ल्ड अफेयर्स की वरिष्ठ फेलो कैथरीन मार्शल ने भी उद्घाटन समारोह को संबोधित किया।
इस अवसर पर इंटरनेशनल ज्यूइश कमेटी फॉर इंटररिलिजियस कंसल्टेशंस के अध्यक्ष रब्बी मार्क ड्रैच, अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव, परमार्थ निकेतन डा साध्वी भगवती सरस्वती जी, इक्यूमेनिकल पैट्रिआर्केट के वरिष्ठ धर्माधिकारी मेट्रोपॉलिटन इमैनुएल ऑफ चाल्सेडॉन, रिलिजन्स फॉर पीस के महासचिव डॉ. फ्रांसिस कुरिया कागेमा तथा अमेरिका में कैथोलिक चर्च के अपोस्टोलिक नुनसियो, होली सी की ओर से संदेश देने वाले मोस्ट रेवरेंड गैब्रिएले जिओर्दानो काचिया ने अपने विचार रखे। समापन प्रार्थना हाउस ऑफ लॉर्ड्स के रेवरेंड रसेल रूक ने प्रस्तुत की-आशा कोई प्रतीक्षा नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है जिसका निर्माण किया जा सकता है।
अपने संबोधन में डा साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि आशा का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कठिनाइयाँ नहीं आएँगी, बल्कि आशा वह आंतरिक सामर्थ्य है, जो कठिन परिस्थितियों में भी सौंदर्य, सद्भाव और सृजन की संभावनाओं को जीवंत रखती है। उन्होंने ऐतिहासिक टैबरनेकल के निर्माण से जुड़ी लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबी और संघर्षपूर्ण यात्राओं के बाद वहाँ पहुँचे लोगों ने एक दुर्ग नहीं, बल्कि ऐसा स्थान बनाया जहाँ लोग एक साथ गा सकें। यह इस बात का प्रतीक है कि संघर्ष के बीच भी हम सौंदर्य और सामंजस्य का सृजन कर सकते हैं।
अमेरिका में जन्मीं और विगत तीन दशकों से हिमालय की गोद में माँ गंगा के पावन तट परमार्थ निकेतन में पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर रहीं साध्वी जी ने अपने जीवन-अनुभव के माध्यम से भारत की प्राचीन आध्यात्मिक चेतना और वैश्विक मानवीय सरोकारों के बीच एक आत्मीय सेतु के विषय में चर्चा की। उन्होंने कहा कि आशा कोई ऐसी मनःस्थिति नहीं, जिसकी प्रतीक्षा की जाए; आशा एक ऐसी क्षमता है, जिसका विकास किया जा सकता है। प्रत्येक धर्म और आध्यात्मिक परंपरा अपने सर्वाेत्तम स्वरूप में मनुष्य को आशा, आत्मविश्वास और सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देती है।
साध्वी जी ने आह्वान किया कि विश्व को जोड़ने से पहले स्वयं के भीतर और अपने संबंधों में आई टूटन को जोड़ना होगा। दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मचिंतन, करुणा और विश्वास को अपनाकर ही आंतरिक शांति से वैश्विक सद्भाव तक की यात्रा संभव है।

साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भारत की जी20 अध्यक्षता के दौरान प्रस्तुत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्राचीन वैदिक संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। हम सभी एक ही पृथ्वी की संतान हैं और हमारा भविष्य परस्पर जुड़ा हुआ है। यह दर्शन केवल आध्यात्मिक चिंतन का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णयों, सामाजिक नीतियों और मानवीय व्यवहार का मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि विश्व वास्तव में एक परिवार है, तो भूख, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, ऋण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर लिए जाने वाले निर्णयों में सबसे कमजोर और वंचित समुदायों के कल्याण को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। स्वच्छ जल, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा से वंचित बच्चे केवल आँकड़े नहीं हैं; वे हमारे अपने परिवार के सदस्य हैं। किसी भी परिवार की वास्तविक संवेदनशीलता इस बात से प्रकट होती है कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्यों की कितनी देखभाल करता है।
साध्वी जी ने आस्था को मानवता की सेवा और सकारात्मक परिवर्तन से जोड़ते हुए कहा कि आध्यात्मिकता केवल प्रार्थना, उपासना और व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आस्था हमें जीवन, प्रेम, मानवीय गरिमा और आशा के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने पृथ्वी के संरक्षण को सामूहिक उत्तरदायित्व का अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि साझा भविष्य की कल्पना तभी सार्थक होगी, जब मानवता प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को समझे और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ एवं संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित करने का संकल्प ले।
भारतीय वैदिक परंपरा की समन्वयकारी चेतना को उद्घाटित करते हुए साध्वी जी ने ऋग्वेद के सामूहिक प्रगति और सद्भाव के संदेश का स्मरण कराया-“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”अर्थात् हम साथ चलें, साथ संवाद करें और हमारे मनों में सामंजस्य स्थापित हो।
अपने संबोधन के समापन पर साध्वी भगवती सरस्वती जी ने भारत की सार्वभौमिक शांति-प्रार्थना के माध्यम से समस्त सृष्टि के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की मंगलकामना की- ऊँ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्”
साध्वी भगवती सरस्वती जी का यह संबोधन भारतीय सनातन दर्शन की सार्वभौमिक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। उनका संदेश स्पष्ट है, विश्व में स्थायी शांति तभी संभव है, जब आशा हमारे विचारों में, करुणा हमारे संबंधों में और सेवा हमारे कर्मों में साकार हो।
