यश हरिद्वार न्यूज़ ✍️

अरुण कुमार पाठक रिपोर्ट ✍️
08 दिसंबर 2025 हरिद्वार--“धर्मनगरी के अपने स्वरूप से एक कदम और आगे आगे बढ़कर हरिद्वार बहुत तेजी से ‘साहित्य नगरी’ के रूपमें भी अपनी पहचान बनाता जा रहा है। साहित्य एवं रचनाधर्मिता अधिक से अधिक समृद्ध हो, इसके लिये सभी रचनाकारों के मध्य निरन्तर संवाद होते रहना आवश्यक है। साथ ही रचनाकारों को एक दूसरे के कृतियों की सार्थक व सकारात्मक समीक्षा भी करनी चाहिये।”
हरिद्वार के साहित्य एवं साहित्यकारों के सम्बन्ध में उपरोक्त विचार ‘शब्दगंगा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच’ की ओर से हरिद्वार प्रेस क्लब के हुतात्मा गणेश शंकर विद्यार्थी सभागार में आयोजित भव्य कवि गोष्ठी एवं साहित्यकार सम्मान समारोह में कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए देहरादून के 84 वर्षीय वयोवृद्ध कवि असीम शुक्ल ने व्यक्त किये। साथ ही बाद उन्होंने अपना गीत ‘हम चंदनवन के आसपास रहते है, तुमको साँपों से भय न लगे तब आ जाना’ सुना के श्रोताओं की वाहवाही भी लूटी। कार्यक्रम में आसपास के शहरों पधारे कवियों के साथ-साथ हरिद्वार के स्थानीय रचनाओं ने भी अपनी-अपनी विधाओं में काव्यपाठ कर तालियाँ बटोरी। शब्द गंगा के संस्थापक व कार्यक्रम संयोजक, वरिष्ठ पत्रकार व कवि ब्रिजेन्द्र हर्ष के कुशल संचालन में आयोजित गोष्ठी के अंत में सभी प्रतिभागी कवियों को सम्मान पत्र, पुष्पमाल, अंगवस्त्र तथा उपहारों के साथ सम्मानित किया गया।

डा. मनोरमा नौटियाल में ने ग़ज़ल- ‘बेसबब बिन बात अपना बेकरारियाँ, लम्हा-लम्हा रात दिन ख़ुमारियाँ’ से गोष्ठी की शुरुआत की। ‘गीत रखते हुए सहारनपुर के डाॅ० विजेन्द्र पाल शर्मा के कहा- ‘आज छप्पन भोग हैं पर तुम नहीं हो, सब सफल संयोग हैं पर तुम नहीं हो।’ अम्बर खरबंदा ने कहा- ‘उलझे-उलझे से सवालात नहीं लिखे हैं’, तो देहरादून के शायर शादाब मशहदी ने ‘अनुरोध सभी परिपूर्ण करो, हमको विनती करना नहीं आता’ सुना कर माहौल को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। देहरादून के सतीश बंसल ने समझाया- ‘बिना बात की बात पर करके वाद-विवाद, जीवन के अनमोल पल मत करिये बर्बाद।’
रुड़की से आये महावीर सिंह ‘वीर’ ने बताया- ‘ छोटी-छोटी बातों पर भी देना ध्यान जरूरी है केवल खास नहीं हर चेहरे की मुस्कान जरुरी है।’ डाॅ० क्षमा कौशिक ने ‘शिव शंकर की तपस्थली है बद्रीनाथ का द्वार, मोक्ष उसे मिलता है निश्चित जो आता हरिद्वार’ कह कर देवभूमि को नमन किया। दर्द गढ़वाली ने फर्माया- ‘छोड़ गये है बाबूजी जब से दुनिया, अम्मा की है दुनियादारी बक्से में। कृष्ण कुमार सुकुमार ने ज़िन्दग़ी का फल्सफ़ा यूँ बयाँ किया- ‘तमाम ज़िन्दगी बेकार तामझाम किया, ज़रा सी राख़ बची जब सफर तमाम किया।’ रुड़की के ओमप्रकाश ‘नूर’ की शिकायत थी- ‘मुझको मेरी उम्मीद से कुछ कम नहीं मिला, लेकिन मेरे मिजाज़ का मौसम नहीं मिला।’ कवि ब्रिजेन्द्र हर्ष ने कहा- ‘जितनी नफ़रत मिली मुझे ख़ैरात में, उतना दूंगा प्यार तुझे सौगात में।’
इससे पूर्व माँ शारदा के समक्ष दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण, पुष्पांजलि तथा डाॅ० विजय त्यागी की वाणी वंदना से हुई इस आयोजन की शुरुआत पर हरिद्वार के आमंत्रित कवियों ने भी खूब समां बाँधा। वरिष्ठ गीतकार सुभाष मलिक ने ‘शहर तुम्हारी प्रशंसा पर लिख दीं बहुत किताबें मैंने, लेकिन मैं अपनी बस्ती के गीत नहीं लिख पाया’ अपनी पीड़ा दर्ज कराई। साहित्यकार व चेतना पथ सम्पादक अरुण कुमार पाठक ने हर वर्ष दुनियाभर से हरिद्वार में गंगा किनारे डेरा डालने वाले प्रवासी पक्षियों का – ‘दूर देश से उड़ कर पंछी जब-जब आते हैं, प्रेम संदेशा साथ लिये, हमें राह नई दिखलाते हैं’ के साथ स्वागत किया। शब्द गंगा के संस्था अध्यक्ष कुंअर पाल सिंह ‘धवल’ ने मनमोहक गीत – ‘पीर पिघली नहीं गीत ढल ना सका, गीत की चाह में ज़िन्दग़ी ढल गई’ रखा।
डाॅ० मीरा भारद्वाज ने – ‘साधक अथाह निःशब्द मौन, हद की एक सीमा रखता है’, डाॅ० सुशील त्यागी ने- ‘प्रगल्भपूर्ण वीर हों, करें प्रमाण वेग से’, युवा कवि अरविन्द दुबे ने ‘उस बाप का किस तरह, कटता है बुढ़ापा, जिस बाप को बेटे का सहारा नहीं होता’ के साथ अपनी-अपनी बात कही। सह-संयोजक डाॅ० अशोक गिरि ने- ‘आओ हम हिन्दी का विकास करें’ से हिन्दी का महिमा मंडन किया। डाॅ० अरविन्द नारायण मिश्र ने ‘नदी नहीं मैं गंगा हूँ’ के साथ माँ गंगा को नमन किया। इस साथ ही डा० पुष्पा रानी वर्मा, डाॅ० प्रकाश माल्शे, सुमन लता उनियाल, डाॅ० शिव शंकर जायसवाल, साधुराम पल्लव, दीन दयाल दीक्षित, डाॅ० मेनका त्रिपाठी, मदन सिंह यादव, डाॅ० प्रेरणा पांडेय, डाॅ० एन०पी० सिंह, प्रशांत कौशिक ने भी काव्य पाठ किया। कार्यक्रम में समाज सेवी जगदीश लाल पाहवा, विजय पाल वघेल, कवियित्री आशा साहनी, अपराजिता, प्रेस क्लब के सचिव दीपक मिश्रा, डाॅ० मनीष कुमार आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
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